छत्तीसगढ़

मनेंद्रगढ़ शहर में किराना दुकानो में एमआरपी से ज्यादा दाम में बेच रहे खाद्य सामग्री स्थानीय प्रशाशन है बे खबर

कलयुग की कलम

मनेंद्रगढ़ शहर में किराना दुकानो में एमआरपी से ज्यादा दाम में बेच रहे खाद्य सामग्री स्थानीय प्रशाशन है बे खबर

मनेंद्रगढ़ शहर में कोरोना काल मे बढ़ी कलाबाजारी स्थानीय प्रशासन बेखबर

रिपोर्टर तेजा सिंह

मनेंद्रगढ़ कोरिया -कोरोनाकाल में बढ़ी कालाबाजारी और जमाखोरी, उपभोक्ता त्रस्त मनेंद्रगढ़ शहर में यदि बात करें तो कोरोना पूरे शहर में तांडव मचाया हुआ है लेकिन व्यापारी उचित दाम से ज्यादा में किराना सामग्री बेच कर मुनाफाखोरी में लगा हुआ है।

कोरोना काल में बाजार में जो सामग्री बेची जा रही है वह 20-30 प्रतिशत बढ़े हुए एमआरपी में मिल रही है। आवस्यक चीजों में टूथपेस्ट, ब्रश, साबुन,टलकम पाउडर, राशन में दाल, चावल, तेल, नमक, पीसा मसाला, काजी किसमिस की तो बात ही मत करो। अब ये सिर्फ देखने की वस्तु हो गई है। आलू-प्याज, और हरी सब्जियों ने उपभोक्ताओं को इतना पीस दिया है कि उसके बजट का पेस्ट बन गया है। जहां भी खरीदी के लिए जाता है वहां से लूट मचा हुआ है। 20 हजार कमाने वाले को घर चलाने में लाले पड़े है तो सोचों गरीब और मध्यमवर्गीय परिवार कैसे जिंदगी बसर करता होगा जबकी लाकडाउन लगा हुआ है और काम भी बंद पड़े है। राज्य सरकार न मुनाफाखोरों पर अंकुश नही कस रही और न ही थोक विक्रेताओं पर। राज्य सरकार को एक नीति निर्धारित करनी चाहिए कि कौन सा सामान किस मूल्य पर बेचा जाए,एमआरपी में उत्पादक थोक विक्रेताओं को 30-40 प्रतिशत की छूट देते है, वहीं फुटकर वाला उनसे 15 प्रतिशत छूट कमाता है. उसके बाद भी एमआरपी के ज्यादा मूल्म पर सामान बेचा जा रहा है। जिसके कारण कालाबाजारी बढ़ी है जो रूक नहीं रही है। महीने से बेरोजगारी की मार झेल रहे उपभोक्ताओं को लाकडाउन होते ही किराना सामान, दवाई, एवं अन्य जरूरत की सामान खरीदने में दोहरी महंगाई झेलनी पड़ रही है। मोडिकल मार्केट में जीवन रक्षक दवाई से लेकर इम्युनिटी बढ़ाने वाले दवाइयों के साथ काढ़ा, सेनिटाइजर, मास्क खरीदना आम उपभोक्ताओं की शक्ति के बाहर हो चुके है। किराना गेहू-चावल तो 40 से 50 रुपए किलो में सामान्य चावल मिल रहे है। दाल 130 को पार चुका है, तेल ने भी अपनी धार दिखा दी है, 1200 में मिलने वाला टीन 1900 में मिल रहा है। बाजार पूरी तरह से बन्द है लेकिन चोरी से दुकानों में सामग्री चार गुना रेट में उपभोक्ता खरीदे में मजबूर है।लाकडाउन में लोगो का बजट खराब हो चुका है चार गुना रेट में खरीदे या खाए नहीं । कोरोना आपदा को थोक विक्रेताओं और फुटकर विक्रेताओं ने कमाई का अवसर मान लिया है। लाकडाउन होने के कारण से बाजार में हर सामान की काला बाजारी जमकर चल रही है। कोई रोकने वाला नहीं है। आम जनता 30 प्रतिशत बढ़े एमआरपी की मार झेलने के लिए मजबूर है। अभी तो लॉकडाउन को व्यापारियों ने त्योहार मान कर अनाप-शनाप दाम पर माल बेचना शुरू कर दिया है। पहले ही कोरोना काल में बाजार में जमाखोरी करने वालों में जमकर लूटमार मचाई है। अब लॉकडाउन होते ही एमआरपी का खेल शुरू हो गया है।

सब्जी हो या सागभाजी, आलू ने उपभोक्ताओं को बना दिया भालू

हर साल की तरह आलू-प्याज और राहर दाल सहित कई जरूरी चीजों की कीमतों में बढ़ोतरी हो गई है निजी संस्थानों में काम करने वाले कर्मचारियों को लाकडाउन लगते ही काम बंद होने से नुकसान का सामना करना पड़ा है। ऊपर से निजी कम्पनी वालों ने कोरोना काल के नाम पर 30 प्रतिशत वेतन में कटोती कर दी है। वही जमाखोरी का खेल हावी और खादय विभाग के अफसर नियंत्रण नहीं कर पा रहे हैं।

दाल नहीं गल रही

राहर दाल की कीमतों में भी तेजी बनी हुई है। थोक में ही राहर दाल इन दिनों 1000 रुपये से 10,000 रुपये प्रति क्विंटल में बिक रही है और चिल्हर में इसका दाम 120 से 130 रुपये किलो तक है। राहर दालों में पखवाड़े भर पहले ही 30 रुपये किलो की तेजी आई है।

अंडे के भी भाव बढ़े

अभी कोरोना काल में लोगों के स्वास्थ्य के लिए अच्छा माना जाने वाला अंडा भी महंगा हो गया है। डेढ़ माह पहले ही पांच रुपये में बिकने वाला अंडा इन दिनों आठ रुपये में बिक रहा है। दुकानदार लाकडाउन का फायदा उठा कालाबजारी करने लगा हुआ है।

दोषपूर्ण वितरण प्रणाली

प्रत्येक सरकार ने महंगाई कम करने का आश्वासन दिया है, किन्तु प्रश्न यह है कि महंगाई कम कैसे हो? उपज में बढ़ोतरी हो, यह आवश्यक है किन्तु हम देख चुके हैं कि उपज बढऩे का भी कोई बहुत अनुकूल प्रभाव कीमतों पर नहीं पड़ता । वस्तुत: हमारी वितरण-प्रणाली में ऐसा दोष है जौ उपभोक्ताओं की कठिनाइयां बढ़ा देता है । ऐसा प्रतीत होता है कि भ्रष्टाचार का सर्वग्रासी अजगर यहां भी अपना काम करता है । वस्तुओं की खरीद और वितरण की निगरानी करने वाले विभागों के कर्मचारी ईमानदारी से काम करें तो कीमतों की वृद्धि को. रोका जा सकता है ।

जिम्मेदारी किस पर* तेल-उत्पादक देशों द्वारा तेल की कीमत बढ़ा देने से भी महंगाई बढ़ी है । वस्तुत: अफसरशाही, लाल फीताशाही तथा नेताओं की शुतुरमुर्गीय नींद महंगाई के लिए पूरी तरह जिम्मेदार है ।

प्याज 20 से 25 रुपये किलो बिका रहा

जहाँ कलेक्टर कोरिया के द्वारा सब्जी वालों को ठेला में सब्जी बेचने के आदेश दिए गए है वही सब्जी ठेला वालो की मनमानी के कारण भी व्यक्ति परेशान है ।इन दिनों में प्याज की कीमत भी बढ़ी हुई है। कुछ दिनों में प्याज लोगों के और रुलाने वाला है। अभी ऊपरी मंडी में ही प्याज की कीमतों में तेजी बनी हुई है। इसके विपरीत आलू की कीमतों में भी बढ़ोतरी हुई है। थोक में आलू 15 रुपये किलो और चिल्हर में 20 रुपये किलो में बिक रहा है। प्याज आलू की कीमतों में अभी तेजी के ही संकेत है। यदि कोई जमाखोरी कर रहा है तो उस पर कड़ी कार्रवाई होगी चाहिए ।लेकिन अधिकरियों की कहाँ है चिंता। अब यह देखना है कि हो रही कालाबाजारी को रोकने में प्रशासन हो पायेगा कामयाब की ऐसे ही जनता को लूटते रहेंगे व्यापारी।

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