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महामहिम राष्ट्रनिष्ठा की अग्निपरीक्षा

कलयुग की कलम

महामहिम राष्ट्रनिष्ठा की अग्निपरीक्षा

विश्व जानता है कि महामहिम राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के खांटी स्वंयसेवक तथा भारतीय जनता पार्टी के समर्पित कार्यकर्ता हैं । राष्ट्रपति बनने के बाद भी विभिन्न कार्यक्रमों की तस्वीरों में उनकी भावभंगिमा भी इसकी पुष्टि करती प्रतीत होती हैं । मग़र वर्तमान में जिस तरह कोरोना संक्रमण राष्ट्रीय महामारी में तब्दील हो चुका है तथा मोदी सरकार से लेकर तमाम एजेंसियां कोरोना महामारी से देश को बचाने में पूरी तरह फेल हो चुकी हैं । दुनिया भर में देश की साख गिर रही है । तमाम देशों के प्रतिष्ठित अखबारों की लीडिंग न्यूज़ में भारत सरकार की नाकामियों सहित श्मशानों में जल रही सामूहिक चिताओं की तस्वीरें छाई हुई हैं । तब देश आपकी तरफ देख रहा है । यह समय राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ तथा भारतीय जनता पार्टी की निष्ठा निभाने की जगह देश और देशवासियों के प्रति निष्ठा निभाने का है । आज देश के प्रति आपकी निष्ठा की अग्निपरीक्षा का समय है । आप बिना देर किए अपने संवैधानिक अधिकारों का प्रयोग करते हुए देश में राष्ट्रपति शासन लगाए जाने की घोषणा करें ।

देश की अर्थव्यवस्था चौपट हो चुकी है । महंगाई सुरसा की तरह अपना मुंह फैलाये निम्न, मध्यम परिवारों को अपना निवाला बनाती जा रही है । बेरोज़गारी ने नए कीर्तिमान रच दिए हैं । संवैधानिक संस्थानों का अस्तित्व समाप्त होता जा रहा है । धरती से लेकर आसमान तक बेचा जा रहा है । लॉ एंड ऑर्डर पूरी तरह ध्वस्त हो चुका है । देशभर में भय और आतंक की धुंध छाई हुई है ।

फिरकापरस्त ताकतों के आगे लोकतंत्र अपना दम तोड़ता जा रहा है । लोकतांत्रिक व्यवस्था के चारों पाये कमजोर पड़ चुके हैं बल्कि यह कहना ज़्यादा सही होगा कि चारों पाये मिल कर लोकतंत्र की आत्मा की हत्या करने की कोशिश में लगे हुए हैं ।

इस बात की ख़बर होने के बावजूद कि कोरोना महामारी का पलटवार होगा । सरकारों ने इस हमले से निपटने के लिए कोई तैयारियां नहीं की बल्कि पहले चरण में की गई कुछ व्यवस्थाओं को भी ख़त्म कर दिया है ।

कोरोना महामारी का पलटवार देशभर में कहर बरपा रहा है । सभी राज्यों में महामारी लाखों लोगों को निगल चुकी है । सरकारें कोरोना वायरस से आमजन को बचाने के लिए चिकित्सा सुविधाएं उपलब्ध कराने के बजाय पलायनवादी रुख़ अख्तियार कर रही है । आम आदमी को भगवान भरोसे छोड़ दिया गया है ।

आमजन का ढ़ाढस बढ़ाने की बजाय उसे डराया धमकाया जा रहा है । आमजन की सुरक्षा के नाम पर तालाबंदी कर उनके घरों को ही खुली जेल में तब्दील कर क़ैद में रखा जा रहा है ।

देश का प्रधानमंत्री अपने सिपहसलारों के साथ सत्ता विस्तार के लिए राज्यों के नागरिकों के जीवन के साथ खिलवाड़ करते हुए चुनावी रैलियां कर चुनाव – चुनाव खेल रहा है । कोविड 19 से बचाव के लिए मुहैया कराई जा रही चिकित्सा एवं अन्य सुविधाओं के सरकारी दावों की ज़मीनी हक़ीक़त पूरी तरह उलट है ।

देशभर के सरकारी अस्पतालों में ज़रूरत के मुताबिक ऑक्सीजन, रेमडिसिवर इंजेक्शन का टोटा बना हुआ है । सरकारी अस्पताल मरीज़ों को बेड तक उपलब्ध नहीं करा पा रहे हैं । मरीजों को ज़मीन पर लिटाया जा रहा है । निजी अस्पतालों ने कोविड 19 की आपदा को अवसर में बदल कर कमाई का साधन बना लिया है । निजी अस्पतालों में न्यूनतम औसतन फ़ीस ही 3 से 4 लाख रुपये है । जिसकी व्यवस्था करना आम आदमी के लिए आकाश से तारे तोड़ कर लाने से कम नहीं है ।

पिछले कुछ दिनों में घटित घटनाएं बहुत ही डरावनी एवं चिंताजनक हैं । अस्पतालों में ऑक्सीजन की पर्याप्त व्यवस्था न होने से भगदड़ मचने की तस्वीरें सामने आ रही हैं । रेमडिसिवर इंजेक्शनकी कालाबाजारी की खबरें आम हो रही हैं । श्मशानों तक में मृतकों का अंतिम संस्कार करने की जगह न होने से सड़कों में क्रियाकर्म करने परिजन मजबूर हैं । सरकार देशभर में हो रही मौतों के आंकड़ों को छुपा कर गुमराह कर रही है ।

कोरोना वायरस महामारी राष्ट्रीय आपदा का रूप ले चुकी है । जिसके लिए ठोस राष्ट्रीय नीति की जरूरत है । मग़र केंद्र सरकार ने अपने हाथ ख़ड़े कर सारा भार राज्य सरकारों पर डाल दिया है । राज्य सरकारों ने भी केंद्र सरकार का अनुसरण करते हुए आम आदमी के जीवन को हाथी, घोड़ा, ऊंट, पैदल रूपी प्रशासनिक अधिकारियों के हाथों सौंप दिया है । सुविधा विहीन प्रशासनिक अधिकारी भी किंकर्तव्यविमूढ़ होकर लॉक डाउन लगाने के अलावा कुछ नहीं कर पा रहे हैं ।

आम आदमी ग़रीब की लुगाई बना प्रशासनिक जुल्मोसितम सहने मजबूर है । विधायिका और कार्यपालिका पर निगरानी करने वाली न्यायपालिका जिसने वकीलों, बुद्धजीवियों, पत्रकारों की जायज़ टिप्पणियों को अपनी अवमानना मानकर स्वमेव संज्ञान लेकर याचिका दायर कर तत्काल सुनवाई करने वाली, आतंकियों तक को न्याय दान की ख़ातिर आधी रात को भी न्यायपालिका के दरवाजे खोलकर इतिहास रचने वाले न्यायमूर्तिगण भी स्वमेव संज्ञान लेकर चुनाव रैली के माध्यम से लाखों की भीड़ इकट्ठा करके कोविड 19 संक्रमण का ख़तरा फैलाने वाले नरेन्द्र मोदी, अमित शाह, शिवराज सिंह चौहान जैसे तमाम नेताओं सहित चुनाव आयोग के आयुक्तों के ख़िलाफ़ जनता की हत्या और हत्या के प्रयास का मामला दर्ज़ करने का आदेश देने का साहस दिखाकर न्यायपालिका के जीवित होने का प्रमाण देश को देने के बजाय सत्ता की चौखट पर अपनी आंखें मूंदे नतमस्तक दिखाई दे रहे हों तो फ़िर…..!

मान न मान मैं तेरा मेहमान की तर्ज़ पर ख़ुद को लोकतंत्र का चौथा स्तंभ कहने वाला मीडिया तो पहले ही अपने ज़मीर को सरकार और सरकारी नुमाइंदों की चौखट पर गिरवी रखकर दरबारी बना हुआ है ।

जब से नरेन्द्र मोदी ने देश की बागडोर पकड़ी है तबसे आज तक कदाचित एक बार भी यह साबित नहीं कर पाए कि वे भारतीय जनता पार्टी के नहीं भारत देश के प्रधानमंत्री हैं । ठीक ऐसा ही हाल राज्यों के मुख्यमंत्रियों के हैं । मतलब साफ़ है कि नरेन्द्र मोदी राजधर्म निभाने में पूरी तरह विफ़ल हो चुके हैं । इसी तरह राज्यों के मुख्यमंत्री भी राजधर्म का पालन करने में असफल साबित हो चुके हैं ।

देश में जब चारों ओर संकट की काली घटाएं छाई हुई है तो देशवासियों की नजर राष्ट्रधर्म निभाने के लिए देश के प्रथम नागरिक महामहिम राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद पर टिकी हुई है ।

देश के मन की बात यह है कि महामहिम राष्ट्रपति को बिना देर किए आमजन की हत्या और हत्या के प्रयास में लगी सरकार को बर्खास्त करते हुए देश में राष्ट्रपति शासन लागू कर देश को राष्ट्रीय आपदा से बचाने के लिए देश की बागडोर अपने हाथ में लेकर राष्ट्रधर्म निभाना चाहिए ।

 

अश्वनी बड़गैंया, अधिवक्ता

स्वतंत्र पत्रकार

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