मध्यप्रदेश

आस्था की आड़ में जिंदगी से खेलना अपराध है तो मरकज़ पर बोलने वाले कुंभ पर चुप क्यों ?

कलयुग की कलम

आस्था की आड़ में जिंदगी से खेलना अपराध है तो मरकज़ पर बोलने वाले कुंभ पर चुप क्यों ?

 

         दरक रहा है हैलुसिनेशन

नमो द्वारा सत्ता सम्हालने के बाद देश में हैलुसिनेशन पैदा किया गया । मतलब देशवासियों को वास्तविकता से परे एक दूसरी दुनिया में तैरने के लिए छोड़ दिया गया ।

बुलेट ट्रेन, स्मार्ट सिटी, सबसे ऊंची मूर्ति, सबसे बड़ा हवाई जहाज, सबसे बड़ा कैपिटल काम्प्लेक्स जैसे बड़े राष्ट्रीय प्रतीक रचे गए ।

इतना ही नहीं भवन, प्रोजेक्ट के अलावा व्यक्ति (ख़ुद) को भी राष्ट्रीय प्रतीक बनाया गया । शेर की तरह चलता नेता, लाखों का जमावड़ा, सुसज्जित मंच, फूल, एरियल शॉट्स, नी लेवल से खींचे गए स्नेपस । मसल फलेक्सिंग, पड़ोसियों को धमकाना, ज़बानी लड़ना, शेख़ी बघारना, कूटनीतिक तौर पर अनएडवाईजेबल लूज टाक खुल्लमखुल्ला करना, दूसरे देशों की राजनीति में दख़ल देना, दूसरे धर्मों यथास्थिति और सामान्य प्रशासनिक इक्विलिब्रियम को छोड़ना ।

इतना ही नहीं विश्वगुरु, मोस्टपावरफुल नेशन, शक्तिशाली भारत, शक्तिशाली दल, शक्तिशाली हिन्दू हैलुसिनेशन को भी राष्ट्र सम्मान के साथ जोड़ दिया गया । जिसने नमो एंड कम्पनी को राष्ट्रीय संसाधनों को लूटने की खुली छूट दे दी ।

नमो देशवासियों को अपनी हैसियत से, आम व्यवहार्य सीमाओं से भी बड़ी मृगमरीचिका को पीछे छोड़ता हुआ जहां आंखें हैरत से फटी पड़ रही थीं यह जानते हुए भी कि जो दिखाया जा रहा है वो हमारी हैसियत से ऊपर का है फ़िर भी अचंभित कर रहा है । दिल गदगद होकर प्रशंसा करने को मचल रहा है । और यहीं से पैदा किया गया हैलुसिनेशन । यही हैलुसिनेशन ही लूट की छूट की जननी है ।

नमो को जरा भी अंदाजा नहीं था कि पलटवार करने वाली कोरोना की दूसरी लहर उसके द्वारा रचे गए हैलुसिनेशन को तोड़कर रख देगी तभी तो कोरोना की पहली लहर को मोदी एंड कम्पनी ने बड़े हल्के में लिया था ।

कोरोना से निज़ात पाने के लिए ताली थाली शंख, घड़ियाल, दिया मोमबत्ती का सहारा लिया गया । देश को तालाबंदी के कुचक्र में लपेट दिया गया । आम देशवासियों को दर – दर की ठोकरें खाने के लिए बेसहारा छोड़ दिया गया । सालभर हाथ पर हाथ धरे बैठे रहे कोई नये इंतज़ामात नहीं किये गए बल्कि कोरोना से लड़ने के लिए किये गये इंतज़ामों में से कइयों को ख़त्म भी कर दिया गया । राष्ट्रीय संसाधनों को दोनों हाथों लूटा जाता रहा ।

आज हालात यह है कि कोरोना की दूसरी लहर नमो एंड कम्पनी द्वारा रची गई हैलुसिनेशन को तोड़ रही है । अस्पताल, बिस्तर, दवा, चिता की लकड़ी का अभाव मोदी एंड कम्पनी द्वारा पिलाई गई अफ़ीम के नशे को न केवल उतार रही है बल्कि नशा उतरने के बाद होने वाला सिरदर्द पैदा कर रही है । जिसे बर्दाश्त करना कठिन है ।

मितरो की कम्पनी इतना जानती है कि देश की इकॉनमी दिवालिया हो चुकी है । शिक्षा, स्वास्थ्य, इंफ्रास्ट्रक्चर, सेवाएं , समाज व्यवस्था सब तार – तार हैं । चरम पर आ चुकी बेरोजगारी और महंगाई अब लूट, हत्या, दबंगई, बलात्कार सहने या करने का ख़तरा पैदा कर रहा है ।

देशभर में कोरोना के कहर बरपाया हुआ है । अस्पतालों में अफरातफरी मची हुई है । मरीज़ आकस्मिक और जीवन रक्षक दवाओं के अभाव में दम तोड़ रहे हैं । मृतकों के अंतिम संस्कार तक के लाले पड़ रहे हैं । सरकारी और दरबारी मीडिया की लाख कोशिशों के बावजूद झूठे दावों की कलई खुल रही है । ज़मीनी स्तर पर हालात बद से बदत्तर होते जा रहे हैं ।

मितरो एंड कम्पनी लगातार अपनी जिम्मेदारियों से पल्ला झाड़ती जा रही है । ताज़ी जानकारी के मुताबिक जीवन रक्षक दवाइयों की खरीदी से किनारा करते हुए यह काम राज्य सरकारों के पाले में डाल दिया गया है । राज्यों को दो वैक्सीन कारोबारियों के हवाले कर दिया गया है । अब वे कम्पनियां वैक्सीन जिस क़ीमत पर बेचना चाहें बेचें । यह तो संघीय ढांचे का अपमान किये जाने के साथ ही भारत के इतिहास के सबसे बड़े ख़तरे के वक़्त राज्यों के प्रति अपनी जिम्मेदारी से मुकर जाना भी है ।

कोरोना नमो कम्पनी की प्राथमिकता में है भी नहीं ! उसे तो कोरोना से ग्रसित और मर रहे लोगों से ज़्यादा चिंता हैलुसिनेशन की है जिसे कोरोना की दूसरी लहर तोड़ रही है ।

आपदा को अवसर में बदलने में सिद्धहस्तों के लिए फ़िर से हैलुसिनेशन बना देना कठिन काम नहीं है । हैलुसिनेशन के उतर रहे नशे को फ़िर उत्साह से लबरेज करने के लिए अगली डोज़, कुछ नई छवियां, कुछ नए प्रॉजेक्ट, कुछ नई लड़ाइयां खोजने पर काम शुरू कर दिया गया है । जिसका खुलासा भी जल्द सामने आ ही जायेगा ।

फ़िलहाल लोगों को आग लगने के बाद कुंआ खोदने जैसा कोविड अस्पताल बनाने का झुनझुना पकड़ाया जा रहा है । जब तक कोविड अस्पताल बनकर तैयार होंगे तबतक कितने परिवारों के दीपक बुझ चुके होंगे ! जिसकी कल्पना करना भी दूभर है ।

जैसी जानकारी मिल रही है उसके मुताबिक आज की स्थिति में देशभर में औसतन 30 लाख वैक्सीन टीके रोज लग रहे हैं यानी माह में 9 करोड़ टीकों की जरूरत होगी । जबकि दोनों वैक्सीन उत्पादक कम्पनियां मिलकर 7.5 करोड़ टीके ही बना पा रही हैं ।

16 जनवरी से वैक्सीनेशन का काम शुरू किया गया है । पहले चरण के बाद आम लोगों में 60 साल से ऊपर आयु वालों को टीके लगाने को कहा गया । वैक्सीनेशन की गाड़ी अभी पटरी पर आई ही थी कि 45 साल से ऊपर वालों को टीके लगाने की घोषणा कर दी गई । गाड़ी में पूरी तरह से न तो 60 साल वाले सीट ले पाए थे न ही 45 साल वाले कि अब घोषणा कर दी गई कि 18 साल से ज़्यादा उम्र वालों को भी टीका लगाया जायेगा । यह तो वही हो रहा है कि मल है नहीं और सुअरों को न्यौता पर न्यौता दिया जा रहा है ।

नमो ने कहा था कि मेरे खून में व्यापार है । अब व्यापार देश का, देश की सम्पत्ति का, खून का, लाशों का, क़फ़न का, श्मशान का भी तो हो सकता है ! जिसकी राजनीतिक ज़मीन में नफ़रत, घृणा, जाति आदि के बीज बोकर उसे खून से सींचा गया हो तो उससे संवेदना की उम्मीद करना बेमानी ही होगा !

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने लॉक डाउन लगाने दिए गए अपने आदेश को योगी सरकार की नाफ़रमानी से नाराज़ होकर हाईकोर्ट ने स्वतः बनारस सहित अन्य शहरों में लॉक डाउन लगाने का आदेश स्वतः दे दिया है जो यह बताने के लिए पर्याप्त कि “ना मैं आया हूं, ना मुझे किसी ने भेजा है, मुझे गंगा मां ने बुलाया है” जुमला साबित होकर रह गया है ।

 

अश्वनी बड़गैंया, अधिवक्ता

स्वतंत्र पत्रकार

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