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कहीं देर न हो जाये” क्या सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस स्वमेव संज्ञान लेकर चुनाव रैली के माध्यम से लाखों की भीड़ इकट्ठा करके कोविड 19 संक्रमण का ख़तरा फैलाने वाले नरेन्द्र मोदी, अमित शाह, शिवराज सिंह चौहान जैसे तमाम नेताओं सहित चुनाव आयोग के आयुक्तों के ख़िलाफ़ जनता की हत्या और हत्या के प्रयास का मामला दर्ज़ करने का आदेश देने का साहस दिखाकर न्यायपालिका के जीवित होने का प्रमाण देश को देंगे 

कलयुग की कलम

“कहीं देर न हो जाये”

क्या सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस स्वमेव संज्ञान लेकर चुनाव रैली के माध्यम से लाखों की भीड़ इकट्ठा करके कोविड 19 संक्रमण का ख़तरा फैलाने वाले नरेन्द्र मोदी, अमित शाह, शिवराज सिंह चौहान जैसे तमाम नेताओं सहित चुनाव आयोग के आयुक्तों के ख़िलाफ़ जनता की हत्या और हत्या के प्रयास का मामला दर्ज़ करने का आदेश देने का साहस दिखाकर न्यायपालिका के जीवित होने का प्रमाण देश को देंगे

आम आदमी तो ग़रीब की लुगाई है ।* _उसकी_ *आबरू* _तो_ *लूटने और लुटने* _के लिए ही होती है । हां चुनाव के समय वोट के लिए जरूर कुछ समय के लिए उसकी पूंछ परख हो जाती है । उसके बाद_ *वो मरे या जिये* _किसी को कोई_ *फ़र्क़* _नहीं पड़ता । सारे_ *नियम कानून* _उसकी_ *छाती में मूंग दलने* _के लिए होते हैं । मग़र ख़ास आदमी की तरफ़ कोई आंख उठाकर भी देखे तो उसकी आंख फोड़ दी जाती है ।_ *सारे क़ायदे क़ानून ख़ास आदमियों की चौखट पर नाक रगड़ते* _दिखाई देते हैं । यहीआज का_ *सत्य और हक़ीक़त है ।*

देशभर में_ *कोविड 19 कहर बरपा* _रहा है । कोविड 19 से मरने वालों की तादाद लगातार बढ़ती जा रही है ।_ *अस्पतालों में बेड कम* _पड़ रहे हैं तो_ *श्मशानों में अंतिम संस्कार* _के लिए_ *जगह कम* _पड़ रही है । जहां अस्पतालों में कोविड 19 के मरीजों को_ *जमीन* _पर लिटाया जा रहा है तो वहीं कोविड 19 से मरने वालों का_ *अंतिम संस्कार खुले में सड़कों पर* _हो रहा है ।_

मानवाधिकारों का खुलेआम चीर हरण* _हो रहा है । कोविड 19 से पीड़ित व्यक्ति के परिजनों का हौसला मरीज़ के ईलाज कराने की सोच कर ही हवाहवाई हो रहा है । जहां_ *सरकारी अस्पतालों की अव्यवस्थाएं* _और_ *निजी अस्पतालों के भारी भरकम बिल* _कोरोना से ज़्यादा_ *कहर बरपा* _रहे हैं । सरकारी अस्पतालों के_ *हालात बद से बदत्तर* _हैं ।_ *मरीज़ भगवान भरोसे* _होता है । मरीज़ के परिजन डॉक्टरों के पीछे हाथ जोड़े फ़िरते नज़र आते हैं मग़र डॉक्टर उन्हें_ *तिरछी नज़र* _से भी नहीं देखते । सरकारी अस्पताल_ *नरक यात्रा* _का पूरा सुख और अनुभव करा रहे हैं । वहीं निजी अस्पतालों में सुविधाएं तो हैं मग़र सुविधाओं के नाम पर मरीज़ को भर्ती करने की प्रक्रिया इतनी_ *ज़ालिम* _है कि परिजन सोचकर ही_ *सहम* _जाते हैं । निजी अस्पताल में ईलाज कराने का कम से कम औसतन बिल ही 2 – 3 लाख रुपये होता है । आम आदमी का मन जहां सरकारी अस्पताल में ईलाज कराने पर_ *मरीज़ की मौत* _से_ *आशंकित* _रहता है तो वहीं निजी अस्पताल में ईलाज कराने पर_ *अनाप शनाप भारी भरकम बिल* _चुकाने की_ *फ़िक्र* _से ।_ *आफ़त का पहाड़* _दोनों ओर खड़ा होता है । मतलब साफ़ है कि एक ओर_ *सरकारी अस्पताल अराजक* _बने हुए हैं तो दूसरी ओर_ *निजी अस्पताल नासूर ।* _यह_ *नकारात्मक सोच* _नहीं बल्कि आज की_ *हक़ीक़त* _है ।_

सरकारी और निजी अस्पतालों में भर्ती होकर ईलाज कराने वालों से कहीं_ *अधिक संख्या घर पर रहकर ईलाज कराने वालों* _की है । मग़र_ *काउंसिल* _के ज़रिए इनके_ *ईलाज का कोई सिस्टम* _सरकार ने आजतक विकसित नहीं किया है । सरकार के पास अपनी_ *नाकामियों पर पर्दा* _डालने का एक ही उपाय है_ *लॉकडाउन* _के अंधेरे रास्ते चलकर जनता पर जुल्मो सितम करना ।_ *लॉक डाउन* _किसी भी दृष्टिकोण से_ *समस्या का समाधान* _नहीं है बल्कि ख़ुद अपने आप में_ *समस्या* _है ।_

शासन और प्रशासन को आम आदमी के लिए कोरोना ईलाज* _में अहम माने जाने वाले_ *रेमडिसिवर इंजेक्शन* _की हो रही_ *कालाबाजारी* _को रोकने के साथ उसकी_ *उपलब्धता* _सुनिश्चित करने के लिए ठोस कदम उठाने के साथ ही अपने गेस्ट हाउस, हॉस्टल, स्कूल, कॉलेज, वातानुकूलित ऑफिसेज को_ *फ्री कोविड सेंटर* _में तब्दील करना चाहिए था । निजी अस्पतालों द्वारा_ *आपदा को अवसर* _में बदल कर कोरोना ईलाज के नाम पर की जा रही_ *आर्थिक डकैती* _पर तत्काल रोक लगनी चाहिए थी । मग़र शासन_ *राष्ट्र तथा राज्य* _दोनों स्तरों पर_ *असफल साबित* _हो चुका है ।_ *प्रशासनिक अधिकारियों* _ने अपना_ *मानसिक संतुलन* _खो सा दिया है ।_ *पुलिसिया बर्बरता, दरिंदगी* _हर दिन देश के चारों खूंट सोशल मीडिया की_ *सुर्खियां* _बटोर रही है ।_ *सरकारी और दरबारी मीडिया* _तो मानो अपने_ *ज़मीर को सत्तापक्ष के हाथों बेच* _ही चुका है ।_

जब देश के प्रधानमंत्री* _होने के नाते_ *नरेन्द्र मोदी और उनकी केबिनेट* _की_ *पहली और अंतिम प्राथमिकता कोरोना महामारी* _की_ *रोकथाम* _और_ *आम आदमी की जिंदगी* _बचाने के लिए_ *ठोस रणनीति* _बनाकर_ *कारगर क़दम* _उठाने की होनी चाहिए तब_ *नरेन्द्र मोदी और उनके साथी* _देश के कुछ राज्यों में_ *चुनाव – चुनाव* _खेलने में व्यस्त है । मोदी सहित उनकी पूरी टीम के लोग_ *चुनावी रैलियां में लाखों लोगों की भीड़ इकट्ठा कर कोविड 19 संक्रमण के ख़तरे को फ़ैलाने में पूरे मनोयोग* _से लगे हुए हैं । जो निश्चित रूप से_ *मानव हत्या और हत्या के प्रयास* _का_ *मामला* _बनता है ।_

वकीलों, बुद्धजीवियों, पत्रकारों* _की_ *जायज़ टिप्पणियों* _को अपनी_ *अवमानना* _मानकर_*स्वमेव संज्ञान* _लेकर_ *याचिका दायर कर तत्काल सुनवाई करने वाली, आतंकियों तक को न्याय दान की ख़ातिर आधी रात को भी न्यायपालिका के दरवाजे खोलकर इतिहास रचने वाली देश की सर्वोच्च न्यायपालिका के प्रधान न्यायाधिपति का क्या यह दायित्व नहीं बनता की वे स्वमेव संज्ञान लेकर चुनाव रैली के माध्यम से लाखों की भीड़ इकट्ठा करके कोविड 19 संक्रमण का ख़तरा फैलाने वाले नरेन्द्र मोदी, अमित शाह, शिवराज सिंह चौहान जैसे तमाम नेताओं सहित चुनाव आयोग के आयुक्तों के ख़िलाफ़ जनता की हत्या और हत्या के प्रयास का मामला दर्ज़ करने का आदेश देने का साहस दिखाकर न्यायपालिका के जीवित होने का प्रमाण देश को दें ?*

देश और देशवासियों का यह वाजिब सवाल और आशा भरी नजरें उच्चतम न्यायालय* _की ओर इसलिए भी कि आज भी देशवासियों का अनेक जनविरोधी फैसलों के बाद भी उसी पर_ *आस और विश्वास* _बना हुआ है । इस तरह की अपेक्षा_ *सूरज को चुनौती* _दे चुके_ *महामहिम* _से तो की नहीं जा सकती ।_ *कब्र में सोये पड़े मुरदों को भी चुनौती नहीं दे पा रहे संसद में विराजमान जीवित लाशों की शक्ल अख्तियार कर चुके माननीयों से भी अब कोई उम्मीद नज़र नहीं आ रही है ।*

कोविड 19 की भयावहता का अंदाजा* _इसी बात से लगाया जा सकता है कि_ *ख़ास में भी ख़ास संस्कृति की पोषक, हवा भी जिन्हें उनकी मर्जी के बिना स्पर्श* _नहीं कर सकती उसी_ *न्यायपालिका के जस्टिस* _तक_ *कोरोना संक्रमित* _होने लगे हैं । फ़िर तो_ *आम आदमी की जिंदगी का अनुमान* _सहज ही लगाया जा सकता है ।_

 

अश्वनी बड़गैंया, अधिवक्ता

स्वतंत्र पत्रकार

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