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सब ठीक है जी

कलयुग की कलम

         सब ठीक है जी

 

हमारे कालोनी में सभी अच्छे से खुशी खुशी रहते हैं , दरअसल भाईचारे के पाठ की शुरुआत शायद हमारे कालोनी से ही हुई थी । इसीलिए तो यहां के लोगों का आपसी संबंध बहुत ही अच्छा है ।

हर शख्स यहां एक दूसरे के दुख दर्द को समझता है , इसीलिए गमों को आपस में बांट लेते हैं ।

ऐसे कई उदाहरण मिल जाएंगे जैसे किसी की पत्नी मायके चली गई हो तो उसका पड़ोसी समय पर भोजन की थाली पर बुला लेता है ।

अभी हाल ही में अन्यत्र कहीं से सताए मारे पीटे भगाए गए कुछ आवारा कुत्तों को हमारी कालोनी में आना सबसे अधिक सुरक्षित लगा , शायद आपस में मीटिंग करने के बाद वो इस निष्कर्ष पर पहुंचे थे कि मदर टेरेसा नगर चलो वहां अच्छे दयावान लोग बसते हैं , खाने पीने का जुगाड़ हो ही जाएगा , फलस्वरूप कुछ समय से हमारे कालोनी में ये प्यार के भूखे श्वानों का एक झुंड दिखने लगा था ।

और जिस किसी की भी इन पर नजर पड़ती ये तत्काल दुम हिलाकर उनका अभिवादन करने लगते , और उनकी ये ट्रिक काम कर गई ,लोग बची खुची रोटी या खाद्य पदार्थ इनको देने लगे थे ।

इसी क्रम में आज रविवार की दुपहरी में कालोनी के पीछे बने गंदे नाले को क्रास करते हुए तकरीबन सात आठ भैंसें हमारे कालोनी के सड़क‌ की ओर बढ़ी चली आ रही थी कीचड़ से सनी पूर्ण सज-धज कर ये आपस में बतियाती हंसती चहकती चली आ रही थी ।

ये इन भैंसों का प्रतिदिन का ही काम है , सुबह ये सभी अपनी ड्यूटी पर निकल पड़ती हैं लेकिन जब लौटती हैं तो इसी रास्ते से । क्योंकि उन्हें मालूम ही है कि यहां अच्छे लोग रहते हैं , और कोई भी उन्हें अकारण परेशान नहीं करता है ।

शायद इसी कारण अपनी मस्तानी चाल से चलते चलते सीमेंट की पक्की सड़क पर बतौर गिफ्ट गोबर गिराते चली जाती हैं जो कहीं कहीं पूरे सड़क पर फैल जाती है तो कहीं गोल केक सा भ्रम उत्पन्न करती है ।

मैं अपने दरवाजे पर खड़ा उन्हें जाते हुए देख रहा था । जब वो सभी सिर ऊंचा किए इधर उधर ‌देखती मेरे करीब से गुजरने लगी तब मैंने एक से धीमें स्वर में पूछा -“अरे आज संडे लाक डॉउन है ,पूरा शहर बंद है , तुम्हे किसी ने नहीं रोका ?

इस पर उसने जोर से अपने सिर को हिलाकर शायद परेशान करती मक्खी को भगाया और बोली -“नहीं तो हमें तो किसी ने नहीं रोका ।

उसका उत्तर सुनकर मैं अवाक रह गया था । और सोचने लगा पिछले संडे मैं अपनी पत्नी और बेटे के साथ शाम को अपनी साली साहिबा को देखने जा रहा था , जिसका कि एक्सीडेंट हो गया था ।

तब अहिंसा चौक पर बेरिकेट के पास तैनात वर्दीधारी ने मेरी कार रूकवा कर पूछताछ की ।

मेरे बताने पर कि मैं डाक्टर हूं और पेशेंट देखने जा रहा हूं , इस पर आई कार्ड दिखाने को कहा गया ।

मेरे आई कार्ड को देखने के बाद वो बंदा संतुष्ट हुआ फिर नम्र स्वर में बोला -“सौरी सर – – – -आप जा सकते हैं , ऐसे ही क्वापरेट कीजियेगा प्लीज़ ।”

और फिर बेटे ने नैनो कार आगे बढ़ा दी ।

अब आज मुझे पता चला कि मैं तो पढ़ा लिखा हूं और मेरे पास मेरा परिचय पत्र भी है , लेकिन मेरा रसूख ही नहीं है ।

व्यंग्य रचनाकार

डॉ.मन्तोष भट्टाचार्य

‌‌ जबलपुर

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