मध्यप्रदेश

देश के लिये नासूर बनी राजनीतिक पार्टियां

कलयुग की कलम

देश के लिये नासूर बनी राजनीतिक पार्टियां

सुलगता सवाल – क्या सैनिकों – जवानों के प्राणों की आहूती के लिए होते हैं चुनाव

बंद होनी चाहिए प्रतीकों की ओट से खेला जा रहा कमीनगी भरा राजनीति का खेला

वाकई देश बदल गया है । देश का एक प्रधानमंत्री तत्कालीन रेल मंत्री रहते हुए छोटी सी रेल दुर्घटना पर त्यागपत्र दे देता तो वहीं दूसरा प्रधानमंत्री न्यायालयीन निर्णय से आहत होकर आपातकाल लागू कर देता है और यहीं से शुरू होता है सत्ता बचाये और बनाये रखने का तानाशाही युग जो सतत चला आ रहा है ।

सत्ता हथियाने के लिए जनभावनाओं को भड़काने के लिए शुरू किये गये छद्म धार्मिक, छद्म राष्ट्रवादी प्रतीकों के घालमेल की सफलता स्थाई नहीं रहने की पदचाप पहचान कर ही चेलों ने आने वाले समय में लहू के प्रतीकों के पीछे सुरक्षित रह कर सत्ता हथियाने और उसे सुरक्षित रखने का प्रयोग गुजरात के गोधरा की धरती पर किया गया था । तत्कालीन प्रधानमंत्री ने खिन्न मन से गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री वर्तमानी प्रधानमंत्री को राजधर्म के पालन की सीख देते हुए अप्रत्यक्ष रूप से पद छोड़ने का परामर्श दिया मग़र चेले को बचाने के लिए सामने आये अभेद गुरु कवच ने न केवल कुर्सी सम्हाली बल्कि बड़ी कुर्सी का मार्ग प्रशस्त किया ।

2014 में बड़ी कुर्सी तक पहुंचने के लिए पहले तो चेले ने गुरु को गोबर किया फ़िर गोधरा संस्कृति की छोटी सी झलक चुनाव प्रचार के दौरान बिहार में होने वाली चुनावी जनसभा शुरू होने के पहले दिखाई थी । जो आने वाले समय में किसी बड़े लहू के दरिये का संकेत था । जिसे अमलीजामा 2019 में होने वाले आम चुनाव पहनाया गया । पांच साली सत्ता की करनी करतूत निल बटे सन्नाटा होने के कारण आम चुनाव में जनता के बीच जाने की चिंतित लकीरें चेहरे पर साफ़ झलक रही थी । सत्ता बरक़रार रखने के लिए छद्म धार्मिक, छद्म राष्ट्रवादी प्रतीकों के घालमेल की सफलता संदिग्ध थी । शैतानी संस्कृति की ध्वजवाहक जोड़ी ने लोकसभा चुनाव के ठीक पहले ऐसा कारनामा कर दिखाया कि दसों उंगलियां घी में और सिर कड़ाही में समा गया जब कश्मीर के पुलवामा जिले में पचासों सैनिकों को विस्फोटक मौत के घाट उतार दिया गया । फ़िर क्या था सैनिकों के लहू से सींची गई चुनावी फ़सल ऐसी तैयार हुई कि उससे न केवल सत्ता बरकरार रही बल्कि पहले से ज़्यादा भंडार भर गया ।

2020 में भी ऐसे ही कुछ हालात बिहार में थे । सत्ता बचाना लगभग नामुमकिन दिख रहा था । गोधरा, पुलवामा में घटित प्रतीकों के पीछे सुरक्षित होकर सत्ता बनाये रखने से उत्साहित जोड़ी ने बिहार विधानसभा चुनाव के पूर्व भी वही पांसे फ़ेंके जिसने गलवान घाटी में बिहार रेजीमेंट के बीसों जवानों को फ़िर वापिस न आने की अन्नतयात्रा में भेज दिया । परिणाम सामने था ।

एक बार फ़िर बंगाली सत्ता की भूख ने छत्तीसगढ़ के सुकमा में 24 जवानों को निगल लिया है ।

एक बार फ़िर सत्ता के भूखे भेड़ियों द्वारा सत्ता हथियाने की ख़ातिर सैनिकों का बलिदान बेकार नहीं जाएगा, खून की हर एक बूंद का बदला लिया जायेगा आदि आदि जनभावनाएं भड़काने वाली उदघोषणा कर घड़ियाली आंसू बहाने की नौटंकी की जाएगी । मृतक के परिजनों को जवानों की क़ीमत चंद रुपयों में आंक कर दे दी जायेगी । किसी को नौकरी का आश्वासन रूपी झुनझुना पकड़ा दिया जायेगा । विरोधी पार्टियां खुले मंच पर एक दूसरे को कोसती नज़र आयेंगी और परदे के पीछे चियर्स करेंगी । चुनाव बाद मरघट सी खामोशी पसरी दिखेगी । चीत्कार तो उन घरों में होगी जिनने अपनों को खोया है ।

देश के सीने पर हो रहे नित नए घाव देशवासियों के सामने गंभीर, विचारणीय सवाल खड़ा करते हैं कि क्या भारत के चुनाव देश के सैनिकों और जवानों के प्राण लेने के लिए ही होते हैं ? कल फ़िर किसी चुनाव के पहले राजनीतिक फ़सल काटने के लिए मौत के घाट उतारे जायेंगे सैनिक और जवान ! आख़िरकार ये सिलसिला कब और कहां जाकर ख़त्म होगा ।

देश की राजनीति और राजनीतिक दल देश के माथे पर कभी न मिटने वाले अश्वत्थामी ज़ख्म बनकर रह गए हैं ।

 

अश्वनी बड़गैंया, अधिवक्ता

स्वतंत्र पत्रकार

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