मध्यप्रदेश

जीना इसी का नाम है : लापता बालक को जिया भाई ने बिछड़ी माँ से मिलाया

कलयुग की कलम

जीना इसी का नाम है : लापता बालक को जिया भाई ने बिछड़ी माँ से मिलाया

सतना, (कलयुग की कलम)।किसी की मुस्कुराहटों पे हो निसार किसी का दर्द मिल सके तो ले उधार…., राज कपूर के फिल्म की इन लाइनों को अपनी ज़िंदगी का फलसफा समझने वाले वरिष्ठ पत्रकार, समाजसेवी एवं ज़िला वक़्फ़ बोर्ड सतना के लंबे समय तक अध्यक्ष रहे ज़िया अहमद राज़ जो अपनी सेवाएं ज़िला अस्पताल में भी दिया करते हैं, एक दिन जब अस्पताल पहुंचे तो ऑर्थोपेडिक विभाग के हेड डॉ. डी.के. तिवारी ने ज़िया भाई को बताया कि 18 साल का एक बच्चा जो दिमाग से कमज़ोर है। पिछले 45 दिनों से ज़िला अस्पताल में भर्ती है, जिसकी टांग का ऑपरेशन कर रॉड डाल दिया गया है। अब वह छुट्टी करने के काबिल है, परंतु वह अभी पूरी तरह चल नहीं पाएगा। अमरपाटन थाना की पुलिस ने अहिरगांव ग्राम से एक्सीडेंटल हालत में लावारिस बताकर भर्ती कराया था। अब उसे अस्पताल से डिस्चार्ज करना है आप कुछ सहयोग करिए।

ज़िया भाई ने मरीज़ के पास पहुंच कर पूछताछ की, तो उसने बताया कि उसका नाम मोहम्मद दानिश है। पिता गुज़र चुके हैं। माँ का नाम अस्मा बेगम है और उसकी 4 बहनें हैं। जिनका नाम भी उसने बताया। यह पूछने पर कि कहां के रहने वाले हो उसने मकान नंबर 102 टीना गली केला बागान पता बताया। लेकिन पूछने के बाद भी शहर का नाम नहीं बता पाया। काफी पूछताछ पर ऐसा लगा कि शायद बिहार का रहने वाला हो।

ज़िया भाई ने बिहार वासी ख़लील अहमद जी से संपर्क किया, जो उस समय भारतीय जीवन बीमा निगम की रीवा शाखा में बड़े पद पर पदस्थ थे। जब उनसे बात हुई तो उन्होंने बिहार में उक्त पते से अनभिज्ञता ज़ाहिर की। परंतु उनकी पत्नी अर्शिया ख़लील ने बताया कि केला बागान कोलकाता में है। श्रीमती अर्शिया ख़लील से मिली जानकारी पर मोहम्मद दानिश के घर की तलाश कोलकाता में शुरू हो गई। सतना में रहने वाले कोलकाता निवासी श्रीकुमार कपूर जो सतना से सतना टाइगर नामक अखबार निकालते थे उनका ठाकुर महल के नाम से कोलकाता में रेस्टोरेंट भी है, ने अपने बड़े बेटे राकेश कपूर को फोन लगाकर पता ट्रेस करने को कहा। राकेश कपूर ने 2 घंटे में पता ट्रेस कर दानिश के परिवार को ज़िया भाई का फोन नंबर और मैसेज दे दिया।

संयोग देखिए कि मुसलमानों के पवित्र रमज़ान के रोज़े का महीना था। उस दिन 19वां रोज़ा था। ज़िया भाई का घर ठीक जामा मस्जिद के सामने है। मस्जिद से रात को 8 बजे अज़ान की सदा आई “अल्लाह हू अकबर” और उधर कोलकाता से दानिश की मां अस्मा बेगम का फोन आता है और जब उनसे बातचीत हुई तो वह फूट-फूट कर रोने लगती है उन्होंने कहा वह मेरा बेटा ही है।

बहरहाल वो 2-3 दिन बाद सतना पहुँचती हैं और बताती हैं कि मेरा बेटा दिमाग से कमज़ोर है। तंबाकू खाने को लेकर डांटा तो वह पिछले 6 माह से घर छोड़कर भाग निकला था। हम गरीब बेवा कहां तलाश करते। बस अल्लाह के सामने हाथ फैला कर अपना बेटा वापस मांगते थे। मेरे पति का देहांत हो चुका है। लोगों के घरों में बर्तन झाड़ू कर अपना और अपनी चार लड़कियों और इस बेटे का पेट पालती हूं। ज़िया भाई ने मां अस्मा बेगम और उनके साथ आए उनके पड़ोसी को अस्पताल ले जाकर मां बेटे का मिलन कराया। उस समय रात के 12 बज रहे थे। रोशनी कम थी, पर जो दृश्य था वह ढेरों रोशनी बिखेरते हुए कह रहा था कि ऐसे दृश्य बिरले देखने को मिलते हैं।

ज़िया भाई के प्रयास से समाजसेवी सईद हुसैन ने अपने होटल पैराडाइज़ में नि:शुल्क ठहरने की जगह दी। वहीं समाजसेवी हाजी मक़बूल अहमद ने तीनों लोगों के रेल किराया का प्रबंध किया। अस्मा बेगम दूसरे दिन अपने बेटे को लेकर क्षिप्रा एक्सप्रेस से कोलकाता के लिए रवाना हो गई। रेलवे स्टेशन पर जब ज़िया भाई ने उन्हें अलविदा कहा तो अस्मा बेगम की आंखें डबडबा आईं। उनकी आंखों में आया पानी कृतज्ञता का था या खुशी का, परंतु जाते-जाते ज़िया भाई को कोलकाता आने का न्योता देना नहीं भूली। दानिश के घर पहुंचते ही ईद के दिन दानिश की बहनों ने ज़िया भाई को फोन करके कहा कि भाई आपने हम सब की ईद करा दी। अल्लाह से हम आपके लिए हमेशा दुआ करेंगे। आप कोलकाता ज़रूर आइये।

ज़िया भाई से यह कहानी सुनकर जब मैंने उनसे कहा कि आप कमाल करते हो तो उन्होंने कहा “अल्लाह बहुत बड़ा है। जीना इसी का नाम है।

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