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ताली – थाली, दिया – मोमबत्ती की सालगिरह की तैयारियों का मुआयना करने निकला कोरोना

कलयुग की कलम

ताली – थाली, दिया – मोमबत्ती की सालगिरह की तैयारियों का मुआयना करने निकला कोरोना

अंधा ही होता है सफल राजा, गूंगों की बस्ती का

धार्मिक, जातीय यहां तक कि आर्मी को भी प्रतीक बनाकर सत्ता वरण करने वाली स्वंयभू पार्टी विथ डिफरेंट ने कुछ राज्यों में हुए आम चुनाव में जनता द्वारा नकार दिए जाने से आहत होकर राजनीतिक मूल्यों के मुखड़े को स्याह करते हुए_ *आपदा में अवसर* _बनकर अवतरित हुए_ *कोविड 19 को बिल्ली के भाग्य से टूटे छींके* _की भांति लपकते हुए फ़िर से उन राज्यों में से कुछ में_ *हार्स ट्रेडिंग के मार्फ़त सत्ता हरण करने की चौसर* _बिछाने के बाद मार्च 2020 के आखिरी हफ्ते में देशवासियों की भावनाओं से खेलते हुए पंतप्रधान ने जिस नाटकीयता के साथ_ *ताली – थाली – शंख – घड़ियाल बजाते, दिया – मोमबत्ती जलाते हुए कोरोना गो* _का गलाफाड़ नारा लगाने की जो अपील की गई थी उसकी सालगिरह मनाने का समय आ रहा है

सालभर में कोरोना तो गो नहीं हुआ अलबत्ता हजारों की संख्या में देशवासी जरूर गो हो गए ।

मज़े की बात तो यह है कि_ *सत्तानवीसों के आज्ञाकारी पालतू श्वानों की माफ़िक कोरोना भी जो हुक़्म मेरे आका* _कहते हुए उन राज्यों में जाने से_ *परहेज़ करता रहता है जिन राज्यों में चुनावी चौपड़ खेली जाती हैं ।

बहरहाल चुनावी राज्यों को छोड़कर शेष राज्यों में कोरोना ने फ़िर से तांडव नृत्य करना शुरू कर दिया है ।

जनता भी अपने जनार्दन_की ओर कान लगाकर टकटकी लगाए देख रही है कि कब_ *आकाशवाणी* _सुनाई पड़ेगी_ *मित्रो* _एक साल पहले आप लोगों ने बिना किसी टोकाटाकी के_ *ताली – थाली – शंख – घड़ियाल बजाये थे, दिया – मोमबत्ती जलाकर कोरोना गो बैक का गगनभेदी उदघोष किया था मग़र कोरोना गो नहीं हुआ, कोई बात नहीं ।

समय आ गया है कि आप फ़िर एक बार फलां फलां तारीख़ को शाम 7 बजे से रात 8 बजे तक आप अपनी छाती पीटते हुए कोरोना गो बैक के नारे लगायें

हमारे हुक्मरानों ने तो हुक़्म की तामील करते हुए कोरोना के घूमने फ़िरने में कोई अड़चन न हो इसलिए रात का कर्फ्यू भी लगाना शुरू कर दिया है ।

मित्रो आप भी चतुर बनिये के तीन बन्दरों की माफ़िक प्रहसन करने में साथ दें । जिससे हम विश्व गुरू बनने की दिशा में एक क़दम और बढ़ा सकें ।

वैसे भी हम विश्व गुरू बनने की कतार में लगभग आऊटर पर ही खड़े हुए हैं ।

*गूंगो की बस्ती में अंधे* _भी सफलता पूर्वक_ *राज* _करते हैं । इसकी जीती जागती_ *नज़ीर* _दुनियाभर में निर्विवादित रूप से_ *भारत* _के अलावा_ *दूसरी कोई* _हो ही नहीं सकती ।

 

अश्वनी बड़गैंया, अधिवक्ता

स्वतंत्र पत्रकार

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