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::::: मां की सीख :::::::::::::::::::::

कलयुग की कलम

:::::: मां की सीख :::::::::::::::::::::

कहते कहते हार गए हम

ना रेंगी कानों पे जूं

अरे सुधर जा नालायक तू

लोग करेंगे थू थू थू ।

संस्कार ऐसे न मिले थे

लेकिन बन गए बिगड़े नवाब

दोस्तों से खुद की रईसी

दिखाके क़र्ज़ में डूबे जनाब ।

देख मुसीबत तब मित्रों ने

किया बहाना छोड़ा साथ

कब दोगे पैसे तुम कहकर

बीच सड़क पर पकड़े हाथ ।

घर से निकलना हुआ था दूभर

आंखें गीली रहती थी

राह गलत है ना जा बेटे

मम्मी अक्सर कहती थी ।

काश उस समय माना होता

मम्मी की कही गई बातों को

तो आज दुख में यूं न तड़पता

ना ही जगता सारी रातों को ।

 

डॉ.मन्तोष भट्टाचार्य

जबलपुर (म.प्र)

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