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::: भावनाओं को तो समझो यारों :::

कलयुग की कलम

भावनाओं को तो समझो यारों

बिना हाथों वाले शख्स को भी गुस्सा आता है , कहता है इतनी मार मारूंंगा समझ में आ जाएगी ।

बिना पैरों वाला लाचार , लेकिन क्रोध में नथुने फुलाकर कहता है, दौड़ में मेरी बराबरी कौन कर सकता है भला ?

जब चाहे तब

बिना किसी पूर्व सूचना के , बिजली चली जाती है हमारी कालोनी में ,

तब हम अंधों की तरह आपस में टकराते हैं, और पछताते हैं ,

फिर कहते हैं , आसपास की कालोनी में तो लाईट है और यहां अंधेरा टाईट है , फिर ऐसा भेदभाव क्यों ?

स्टेशन के बाहर खड़ा बहरा कहता है , ट्रेन आने वाली है , उसकी सीटी की आवाज़ साफ सुनाई दे रही है मुझे ।

तभी गूंगा चीखकर कहता है , प्लेट फार्म में जाने से क्या फायदा ?

फ़ालतू में पचास रुपए प्लेटफार्म टिकट के लग जाएंगे ।

उससे तो अच्छा बाहर सस्ते भोजनालय में पचास रुपए में भरपेट खाना खाएंगे ।

        डॉ.मन्तोष भट्टाचार्य

               जबलपुर

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