मध्यप्रदेश

अपराधियों को न तो क़ानून का ख़ौप है न ही पुलिस का भय ।और हो भी क्यों ?

कलयुग की कलम कटनी

अपराधियों को न तो क़ानून का ख़ौप है न ही पुलिस का भय ।और हो भी क्यों ?

कलयुग की कलम….

जहां एक ओर ख़ुद पुलिस खूंखार अपराधियों, सफ़ेदपोश माफ़ियाओं, राजनीतिज्ञों की ड्योढ़ी पर माथा टेक कर गलबहियां डाले गरबा खेलती दिखाई देती रहती है । तो वहीं दूसरी ओर देश में न्याय दान देने वाली संवैधानिक संस्था की सबसे बड़ी कुर्सी में बैठने वाला व्यक्ति रिटायरमेंट के बाद यह कहता है कि अदालत में पहुंच कर तो आम आदमी ख़ुद को ठगा सा महसूस करता है केवल प्रभावशाली और गाँठ से भरपूर आदमी ही अपने मनमाफ़िक न्याय पाता है ।

यह कहना आज भी अक्षरशः सही है कि क़ानून के जाल में छोटी मोटी मछलियां, कीड़े मकोड़े ही फंसते हैं मगरमच्छ तो जाल को फाड़ कर बाहर निकल जाते हैं ।

इससे भद्दा मजाक और दूसरा कोई हो ही नहीं सकता जब यह कहा जाता है कि क़ानून सभी के साथ समान व्यवहार करता है जबकि हक़ीक़त इसके बिल्कुल उलट है ।

देश का क़ानून अपराधी की हैसियत देखकर अपने पंजे फैलाता है । सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश रह चुके व्यक्ति पर जब यौन उत्पीड़न जैसा गंभीरतम आरोप लगाया जाता है तो न्यायमूर्तियों का नज़रिया अलग होता है और जब आम आदमी पर कोई साधारण सा भी आरोप लगाया जाता है तो नज़रिया अलग होता है ।

एक तरफ़ न्यायदाताओं को अपनी बिरादरी के व्यक्ति पर लगा आरोप उसकी छबि ख़राब करने की साजिस नज़र आता है तो दूसरी ओर आम आदमी पर लगा आरोप बदनुमा दाग दिखाई देता है ।

आज देश और राज्यों की सबसे बड़ी पंचायत से लेकर ग्राम पंचायतों तक में हत्या, डकैती, लूट, फ़िरौती, अपहरण, बलात्कार, यौन उत्पीड़न जैसे गंभीरतम अपराधों के आरोपी माननीय, सम्माननीय बन कर लोकतंत्र के चेहरे को घिनौना बना रहे हैं ।

स्वाभाविक है कि जब विधायिका में दागियों की भरमार होगी तो देश की क़ानून व्यवस्था भगवान भरोसे ही होगी ।

पुलिस द्वारा अपनी खाकी पर लगे बदनुमा दाग धब्बों को धोने तथा अपराधियों के सफ़ेदपोश सरपरस्तों को बचाने के लिए यदा कदा कुछ अपराधियों की हत्या एनकाउंटर के नाम पर कर दी जाती है ।

अधिवक्ताओं, बुद्धिजीवियों द्वारा जब भी न्यायिक प्रक्रिया पर सवाल खड़े किए जाते हैं तो सर्वोच्च न्यायालय अपनी अवमानना मानकर संज्ञान लेने से नहीं चूकता । वहीं हप्ता बीतने को आया है राजनीतिक पारी खेलने उतरे रिटायर्ड सीजेआई रंजन गोगोई के व्यक्तव्य को सर्वोच्च न्यायालय की अवमानना मानने का साहस तक न्यायपालिका नहीं दिखा पाई है ।

पुलिस का अपराधियों को किस तरह का संरक्षण मिला होता है उसकी बानगी पन्ना ज़िले में पुलिस कप्तानी करने के बाद कटनी ज़िले की कप्तानी कर रहे मयंक अवस्थी की ईनामी उदघोषणा से सामने आई है ।

जिला पन्ना के अमानगंज थाना क्षेत्र में आने वाले टाई निवासी सुख साहब सिंह राजपूत पिता चंदन सिंह राजपूत को नाबालिग का अपहरण कर बलात्कार किये जाने के आरोप में कटनी ज़िले के उमरियापान थाने में दर्ज़ अपराध संख्या 29/2012 पर 20 फ़रवरी 2021 की दरम्यानी रात को हिरासत में लेकर उमरियापान थाने में लाया जाता है ।

आरोपी सुख साहब सिंह राजपूत पर धारा 363, 366, 376 ता.हि. के साथ ही पाक्सो एक्ट के तहत मामला दर्ज किया गया है ।

मतलब आई ने की तरह साफ़ है कि अपराध अति गंभीर प्रकृति का है । मग़र आरोपी सुख साहब सिंह राजपूत उसी रात को ही पुलिस अभिरक्षा से फ़रार हो जाता है । जो यह बताने के लिए पर्याप्त है कि पुलिस कितनी चुस्त दुरुस्त है ।

यहां यह आशंका जताना लाज़िमी है कि बलात्कार का आरोपी भागा नहीं है उसे भगाया गया है और अब पुलिस कप्तान ख़ाकी पर लग चुके दाग धब्बे को साफ़ करने के लिए पुलिस रेग्युलेशन के पैरा 80 (बी) (1) में निहित प्रावधानों का सहारा लेकर फ़रार आरोपी की सूचना देने वाले को पांच हजार रुपये नगद ईनाम दिए जाने की उद्घोषणा कर रहे हैं ।

मतलब पहले सांप को पकड़ कर जाने दिया गया अब बीन बजाई जा रही है । कहीं यह सारा खेल अपराधियों के सरपरस्त सफ़ेदपोश माफ़ियाओं द्वारा पुलिस कप्तान को किसी चक्रव्यूह में फंसाने के लिए तो नहीं खेला गया !

कटनी से लेखक अश्वनी बड़गैंया, अधिवक्ता स्वतंत्र पत्रकार

Related Articles

Leave a Reply

error: Content is protected !!
Close