प्रयागराज

जाम का झाम- विरोध या विद्रोह रिपोर्टर सुभाष चंद्र पटेल प्रयागराज नैनी

कलयुग की कलम

संवैधानिक व्यवस्था के विपरीत अराजक आंदोलन बना सकते हैं जंगल राज।

-विधायिका, कार्यपालिका व न्यायपालिका स्वयं में गम्भीर व जवाबदेह बनें।

-जातिवादी आरक्षण पर जनमत संग्रह अनिवार्य सत्य।

प्रयागराज। देश में बात-बेबात सड़क जाम, रेल की पटरियां उखाड़ने, सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाने व किसी शहर तक को घेर लेने वाले तथा संवैधानिक व्यवस्था के विपरीत आंदोलन की प्रवृत्ति निश्चित रूप से देश को जंगल राज की तरफ ले जा रहा है।

उपरोक्त बातें मीडिया से करते हुए पीडब्ल्यूएस प्रमुख आर के पाण्डेय एडवोकेट ने कहा कि विगत कुछ दशक से देश मे अराजकतापूर्ण आंदोलनों ने देश के समक्ष एक गम्भीर सवाल पैदा कर दिया है कि क्या हम जंगलराज की तरफ बढ़ रहे हैं। हालात तो इतने बदतर हैं कि मात्र कुछ लोगों की भीड़ बार-बार संवैधानिक व्यवस्था को चैलेंज कर रहे हैं जबकि विधायिका, कार्यपालिका व न्यायपालिका समझौतावादी दृष्टिकोण पर मजबूर नजर आ रहे हैं।

बता दें कि इसी देश में जहां एक प्रार्थना पत्र लेकर परेशान नागरिक घण्टों किसी अधिकारी से मिलने की राह देखता है, एक निर्दोष सालों तक जेल में सड़ता है, योग्य अभ्यर्थी जातिवादी आरक्षण की भेंट चढ़ जाता है व सामान्य से कार्यक्रम के लिए भी प्रशासन की अनुमति अनिवार्य है तो वहीं दूसरी तरफ कुछ लोग जाट आरक्षण, सीएए, एनआरसी, कृषि बिल आदि के विरोध में शाहीन बाग व सिंधु बार्डर जैसे जबरन आंदोलन करके आम नागरिक को परेशान करते हैं जबकि सरकार, न्यायालय व प्रशासन खुद को मजबूर दिखाते नजर आते हैं। जिस देश मे कश्मीरी पंडितों पर अमानवीय अत्याचार, सिक्खों के नर संहार व गोधरा कांड पर लोग मौन रहे उसी देश में आज सामान्य स्तर पर बात करने के बजाय लोग सड़क जाम करके सामान्य नागरिकों के लिए गम्भीर संकट व देश के लिए असुरक्षा पैदा करते हैं। इसी देश में लगभग बीस प्रतिशत तथाकथित सामान्य सवर्ण वर्ग है जोकि जातिवादी आरक्षण के चलते स्वयं को घोर उपेक्षित मानकर जीने को मजबूर है व योग्यता का गला घोंटकर अयोग्य लोगों को सरकारी नौकरी में तरजीह दी रहा है। सरकारें बिना किसी जनमत संग्रह के मनमाने तानाशाही तरीके से इस आरक्षण को प्रति दस वर्ष पर अगले दस साल के लिए बढा दे रही हैं। अब विधायिका, कार्यपालिका व न्यायपालिका स्वयं में गम्भीर व जवाबदेह हों तथा अनिवार्य रूप से आरक्षण पर जनमत संग्रह कराएं अन्यथा यदि अराजक आंदोलन के राह पर चलकर यदि उपेक्षित सामान्य सवर्ण वर्ग अपने अधिकारों के लिए व आरक्षण रदद् करने की मांग के साथ देश भर में आंदोलन पर उतर गया तो उन्हें सम्भालना मुश्किल होगा। अतएव संवैधानिक व्यवस्था के अनुपालन हेतु पारदर्शी व्यवस्था बननी चाहिए। बिना जनमत समग्रह के न तो कोई कानून बने व न ही आरक्षण को बढ़ाया जाए। यदि बने हुए कानून में कोई कमी हो तो उसे रदद् करने की जिद्द के बजाय सुप्रीम कोर्ट में चैलेंज किया जाए।

स्मरण रहे कि अभिव्यक्ति की आजादी केवल तभी तक उचित है जब तक कि वह दूसरों के लिए कष्टप्रद न हो। देश सड़क से नही संवैधानिक व्यवस्था से चलेगा जिसके लिए आम जनमानस के साथ विधायिका, कार्यपालिका, न्यायपालिका व सामाजिक संगठनों को विचार करके जन उपयोगी रणनीति के कार्यशैली अपनानी ही होगी अन्यथा जाम के झाम के रूप में विरोध के नाम पर विद्रोह रूपी अराजक आंदोलन देश की सुरक्षा व स्वतन्त्रता के लिए गम्भीर संकट पैदा करेंगे।

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